भारत में एक राज्य है महाराष्ट्र और इस राज्य के ठाणे जिले में है एक छोटा सा शहर अंबरनाथ। अंबरनाथ इन दिनों चर्चा में है “विकास” के संदर्भ में तमाम राजनीतिक दलों में मची होड़ को लेकर।
कन्फ्यूज्ड? शुरू से शुरू करते हैं। सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव संपन्न हो चुके हैं। अंबरनाथ नगरपालिका के चुनाव दिसंबर में हुए। नतीजे भी आ गए और फिर वह हुआ जो कोई सोच नहीं सकता। भाजपा ने शहर के “विकास” के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर अंबरनाथ विकास आघाड़ी बनाई! मीडिया की प्याली में तूफान मचने और लानत मलामत होने पर कांग्रेस ने अपने सभी 12 पार्षदों को निलंबित कर दिया। फिर आया कहानी में ट्विस्ट।
चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना (एकनाथ शिंदे), जिसके पास 60 सदस्यीय नगरपालिका में 27 सीटें थीं, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चार पार्षदों को अपने पाले में खींच लिया और बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर लिया। राकांपा भी पहले अंबरनाथ विकास आघाड़ी का हिस्सा थी, अब शिवसेना के साथ हो ली। भाजपा ने लेकिन सोचा कि ऐसे कैसे किसी और पार्टी/पार्टियों को “विकास” करने देंगे क्योंकि “विकास” पर उसीका कॉपीराइट है सो पार्टी चली गई हाई कोर्ट।
चूंकि मामला हाई कोर्ट में पहुंच गया तो इस मुद्दे को यहीं विराम देना होगा लेकिन मूल विषय पर अर्थात महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों पर तो बात जारी रखी ही जा सकती है।
सबसे बड़े नगर निगम मुंबई का “विकास” रुका हुआ है। भाजपा की “महा” जीत के मीडिया शोर में पहले दिन पता ही नहीं चलने पाया कि भाजपा 227 सदस्यीय नगर निगम में 89 सीटें पाकर बहुमत से लगभग 25 सीटें दूर है। यहां हालांकि पार्टी शिवसेना (शिंदे) के साथ लड़ी है और गठबंधन की बात करें तो उनके पास बहुमत है। कायदे से दूसरे दिन ही महापौर बन जाना चाहिए था। लेकिन, यहां फिर कहानी में ट्विस्ट आया।
“पोचिंग” के डर से शिंदे सेना ने अपने पार्षदों को एक फाइव स्टार होटल में बंद कर दिया और चाबी समुद्र में फेंक दी। पता है, ऑफिशियली, पार्षदों का मार्गनिर्देशन चल रहा है। सूत्रों के अनुसार महापौर पद के अलावा शिवसेना (शिंदे) ने वित्तीय नजरिए से महत्वपूर्ण स्थाई समिति की अध्यक्षता पर भी दावा जताया है।
बताइए, एक समय शिंदे उद्धव ठाकरे से बगावत कर अपने समर्थक विधायकों के साथ जब अहमदाबाद और गुवाहाटी के होटलों की सैर पर निकले थे तो भाजपा उनके साथ थी। आज भाजपा के डर से वह अपने पार्षदों को होटल में “छिपाने” पर मजबूर हो गए हैं। यह भी तो “विकास” है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस दौरान लेकिन मुंबई के “विकास” को अपने हाल पर छोड़कर दावोस निकल लिए। अब वह 24 जनवरी को लौटेंगे। तब ही मामला सुलझेगा कि मुंबई का “विकास” कौन करेगा।
तब तक “विकास” को इंतजार करना पड़ेगा।
वैसे, “विकास” बिल्कुल नहीं हो रहा, ऐसा भी नहीं है। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का आरोपी जालना नगरपालिका से चुन कर आया है, यह भी तो “पुरोगामी” महाराष्ट्र में विकास का ही एक उदाहरण है। और कितना “विकास” चाहिए?
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में यह अब ओपन सीक्रेट है कि चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद भी “ऑपरेशन लूटस” चला। चुनाव से पहले प्रतिद्वंद्वी ही नहीं मित्र दलों के जिताऊ प्रत्याशियों को अपने पाले में खीचा गया, उम्मीदवारों को लालच/भय दिखाकर बैठाया गया (69 वार्ड में सत्ताधारी पार्टियों के प्रत्याशियों का निर्विरोध चुना जाना), पैसा बांटा गया (सोशल मीडिया में इसके कई वीडियो वायरल हुए हैं)।
चुनाव के दौरान एक नई मशीन (पादु) लाना, स्याही का निशान मार्कर पेन से लगाना, मतदाताओं के बूथ बदल देना (नवी मुंबई में भाजपा के मंत्री गणेश नाईक तक का बूथ बदल गया) और चुनाव के बाद पार्षदों की खरीदफरोख्त, क्या क्या नहीं हुआ या हो रहा।
और, यह सिर्फ सत्ताधारी पार्टियों का मामला भी नहीं है बस उनके पास संसाधन ज्यादा हैं, सरकारी मशीनरी है, तो “विकास” के लिए सबसे ज्यादा ज़ोर उन्होंने लगाया और लगा रहे हैं पर मन तो विपक्षी पार्टियों का भी करता है “विकास” के लिए सो उन्होंने भी अपने स्तर पर जो बन पड़ा, किया और कर रहे हैं।
यह जनता का सौभाग्य है कि नेता लोगों के “विकास” के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं और किस हद तक जा रहे हैं। एक बार थैंक यू नहीं बोलेंगे?
(अस्वीकरण : टिप्पणी में कहीं भी “कथित” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है, सुधी पाठकगण अपने विवेकानुसार जहां उचित समझें, जोड़ लें।)
(कार्टून : आलोक। सकाल से साभार।)
(लेखक मुंबई से जनचौक से सहयोगी के रूप में जुड़े हुए हैं।)